क्या अमेरिका ‘स्पॉइल्स सिस्टम’ की ओर बढ़ रहा है?

अमेरिका लंबे समय से आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान, नवाचार और ज्ञान-उत्पादन का सबसे बड़ा केंद्र रहा है। इस स्थिति के पीछे केवल उसकी आर्थिक शक्ति या विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता ही नहीं, बल्कि वह संस्थागत व्यवस्था भी रही है जिसने विज्ञान को अपेक्षाकृत राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रखने का प्रयास किया। संघीय अनुदानों का वितरण वर्षों से विशेषज्ञों की सहकर्मी समीक्षा, पारदर्शी प्रतिस्पर्धा और वैज्ञानिक गुणवत्ता के आधार पर होता रहा है।

यही व्यवस्था अमेरिकी विज्ञान की विश्वसनीयता की आधारशिला मानी जाती रही है। ऐसे में यदि संघीय अनुदानों को राष्ट्रपति की नीतिगत प्राथमिकताओं से सीधे जोड़ दिया जाए, तो यह केवल प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि विज्ञान और सत्ता के संबंधों में एक बुनियादी परिवर्तन होगा।

यही कारण है कि अमेरिकी पर्यावरण संगठन पब्लिक एंप्लॉयज़ फॉर एनवायर्नमेंटल रेस्पोंसिबिलिटी (पीईईआर) ने अमेरिकी ऑफिस ऑफ़ मैनेजमेंट एंड बजट के प्रस्तावित नियम का तीखा विरोध किया है। संगठन का आरोप है कि यह प्रस्ताव वैज्ञानिक अनुसंधान को राजनीतिक निष्ठा के अधीन करने की दिशा में उठाया गया कदम है।

यह विवाद किसी एक नियम तक सीमित नहीं है। इसके पीछे एक बड़ा प्रश्न छिपा है—क्या लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार को यह अधिकार होना चाहिए कि वह वैज्ञानिक अनुसंधान की दिशा अपनी वैचारिक प्राथमिकताओं के अनुसार तय करे? या फिर विज्ञान की स्वायत्तता लोकतंत्र की मूल आवश्यकता है?

विज्ञान का स्वभाव प्रश्न पूछना है, सत्ता का स्वभाव व्यवस्था बनाए रखना। दोनों के बीच तनाव स्वाभाविक है। इतिहास गवाह है कि जब-जब राजनीतिक सत्ता ने वैज्ञानिक निष्कर्षों को अपने हितों के अनुसार नियंत्रित करने का प्रयास किया, तब-तब ज्ञान का विकास बाधित हुआ। सोवियत संघ में लाइसेन्कोवाद इसका प्रसिद्ध उदाहरण है, जहाँ राजनीतिक समर्थन प्राप्त एक वैज्ञानिक सिद्धांत ने वास्तविक आनुवंशिकी को दशकों तक दबाए रखा और कृषि को भारी क्षति पहुँची।

नाजी जर्मनी में भी विज्ञान का राजनीतिक उपयोग मानवता के विरुद्ध अपराधों तक पहुँच गया। इसलिए आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं ने विज्ञान को यथासंभव संस्थागत स्वतंत्रता प्रदान करने की परंपरा विकसित की।

ओएमबी के प्रस्ताव की सबसे विवादास्पद बात यह है कि अनुदान वितरण में विशेषज्ञ समीक्षा की भूमिका कमज़ोर पड़ सकती है। यदि अंतिम निर्णय राजनीतिक नियुक्त अधिकारियों के विवेक पर निर्भर होगा, तो शोधकर्ता स्वाभाविक रूप से ऐसे विषय चुनेंगे जो सत्ता को पसंद हों। इससे जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण संरक्षण, सार्वजनिक स्वास्थ्य, वैक्सीन सुरक्षा, जैव विविधता, सामाजिक असमानता या प्रदूषण जैसे संवेदनशील विषय धीरे-धीरे वित्तीय संकट का सामना कर सकते हैं।

विज्ञान में सेंसरशिप हमेशा प्रत्यक्ष नहीं होती। कई बार केवल वित्तपोषण रोक देना ही पर्याप्त होता है। जिस विषय को अनुदान नहीं मिलेगा, उस पर शोध भी नहीं होगा। इस प्रकार सत्ता बिना किसी औपचारिक प्रतिबंध के ज्ञान की दिशा नियंत्रित कर सकती है।

ट्रंप प्रशासन के पिछले कार्यकाल और वर्तमान नीतियों को देखें तो जलवायु परिवर्तन, पर्यावरणीय विनियमन और सार्वजनिक स्वास्थ्य संबंधी अनेक शोध कार्यक्रम पहले ही प्रभावित हुए हैं। हजारों शोध अनुदानों का समाप्त होना केवल बजटीय निर्णय नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे वैज्ञानिक प्राथमिकताओं के पुनर्निर्धारण के रूप में देखा जा रहा है। आलोचकों का कहना है कि इससे स्वतंत्र अनुसंधान की संस्कृति कमजोर होती है।

प्रस्ताव का दूसरा गंभीर पहलू पारदर्शिता से जुड़ा है। यदि एजेंसियों को “राष्ट्रीय हित” के नाम पर अनुदानों की सार्वजनिक सूचना रोकने का अधिकार मिल जाता है, तो यह जवाबदेही की पूरी प्रणाली को प्रभावित कर सकता है। लोकतांत्रिक शासन में सार्वजनिक धन का उपयोग सार्वजनिक निगरानी के अधीन होना चाहिए। “राष्ट्रीय हित” जैसी अस्पष्ट अवधारणा का उपयोग प्रशासनिक विवेक को अत्यधिक विस्तृत बना सकता है। इससे पक्षपात, हितों के टकराव और राजनीतिक संरक्षण के आरोपों को बल मिलेगा।

यहाँ एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि क्या हर सरकार अपने राजनीतिक एजेंडे के अनुरूप विज्ञान को पुनर्गठित करेगी? यदि ऐसा हुआ, तो प्रत्येक सत्ता परिवर्तन के साथ अनुसंधान की दिशा भी बदलती रहेगी। विज्ञान का दीर्घकालिक चरित्र ऐसी अस्थिरता को स्वीकार नहीं कर सकता। अनेक वैज्ञानिक परियोजनाएँ दस-दस या बीस-बीस वर्षों तक चलती हैं। यदि उनका भविष्य चुनावी राजनीति पर निर्भर हो जाए, तो ज्ञान-निर्माण की पूरी प्रक्रिया बाधित होगी।

यह तर्क भी दिया जाता है कि करदाताओं के धन का उपयोग सरकार की प्राथमिकताओं के अनुरूप होना चाहिए। यह तर्क पूरी तरह निराधार नहीं है। किसी भी लोकतांत्रिक सरकार को अपनी नीतिगत प्राथमिकताएँ तय करने का अधिकार है। किंतु यह अधिकार और वैज्ञानिक गुणवत्ता—दोनों के बीच संतुलन आवश्यक है। सरकार यह तय कर सकती है कि स्वास्थ्य, ऊर्जा या रक्षा अनुसंधान पर कितना व्यय होगा; लेकिन यह तय करना कि कौन-सा वैज्ञानिक निष्कर्ष स्वीकार्य होगा और कौन-सा नहीं, लोकतांत्रिक विज्ञान की भावना के विपरीत है।

पीईईआर द्वारा प्रयुक्त शब्द “स्पॉइल्स सिस्टम” विशेष ध्यान देने योग्य है। अमेरिकी राजनीतिक इतिहास में यह शब्द उस व्यवस्था के लिए प्रयुक्त होता है जिसमें सत्ता में आने वाला दल सरकारी पदों और संसाधनों का वितरण अपने समर्थकों में करता है। यदि यही प्रवृत्ति वैज्ञानिक अनुदानों तक पहुँचती है, तो विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों और वैज्ञानिक समुदाय की स्वतंत्रता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लग जाएगा।

यह विवाद केवल अमेरिका तक सीमित नहीं रहेगा। अमेरिकी विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों के साथ पूरी दुनिया के वैज्ञानिक जुड़े हुए हैं। भारत सहित अनेक देशों के शोधकर्ता अमेरिकी अनुदानों, संयुक्त परियोजनाओं और शैक्षणिक सहयोग पर निर्भर हैं। यदि अमेरिकी वैज्ञानिक वित्तपोषण राजनीतिक नियंत्रण में आता है, तो उसका प्रभाव वैश्विक शोध जगत पर भी पड़ेगा।

भारत के लिए भी यह प्रसंग विचारणीय है। यहाँ भी समय-समय पर यह बहस उठती रही है कि वैज्ञानिक संस्थानों की स्वायत्तता कितनी हो और सरकार की भूमिका कितनी। अमेरिका जैसी स्थापित लोकतांत्रिक व्यवस्था में यदि विज्ञान और सत्ता के संबंधों पर इतना बड़ा विवाद खड़ा हो सकता है, तो अन्य देशों को इससे सबक लेना चाहिए। विज्ञान की विश्वसनीयता उसकी संस्थागत स्वतंत्रता से आती है, न कि सरकारों की कृपा से।

अंततः यह प्रश्न किसी एक राष्ट्रपति, एक प्रशासन या एक राजनीतिक दल का नहीं है। यह लोकतंत्र की उस मूल भावना का प्रश्न है जिसमें ज्ञान, अनुसंधान और सत्य की खोज को राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से ऊपर रखा जाता है। यदि वैज्ञानिक अनुदान राजनीतिक निष्ठा का पुरस्कार बन जाते हैं, तो सबसे बड़ी क्षति केवल वैज्ञानिकों की नहीं होगी; समाज स्वयं तथ्य और प्रमाण पर आधारित नीति-निर्माण की क्षमता खो देगा।

विज्ञान का उद्देश्य सत्ता की पुष्टि करना नहीं, बल्कि सत्य की खोज करना है। लोकतंत्र तभी स्वस्थ रह सकता है जब सत्ता विज्ञान से असहमत होने का अधिकार रखे, लेकिन विज्ञान को नियंत्रित करने का अधिकार नहीं। अमेरिकी विवाद इसी मूल प्रश्न को एक बार फिर वैश्विक विमर्श के केंद्र में ले आया है।

(शैलेंद्र चौहान लेखक-कवि हैं और अनियतकालिक पत्रिका धरती के संपादक हैं।)

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